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उत्तरी बंगाल की खाड़ी के ऊपर मिली ओजोन की असामान्य मोटी परत, वैज्ञानिकों ने खोजा कारण

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Place: भोपाल                                                👤By: prativad                                                                Views: 106

नई दिल्ली 10 अगस्त 2026। वैज्ञानिकों ने उत्तरी बंगाल की खाड़ी के ऊपर करीब 21 से 23 किलोमीटर की ऊंचाई पर ओजोन की एक असामान्य रूप से मोटी परत का पता लगाया है। इस परत में ओजोन की सांद्रता पूर्वी भारत में सामान्य तौर पर दर्ज स्तर से काफी अधिक पाई गई और यह एक दिन से अधिक समय तक बनी रही। यह खोज वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद कर रही है कि वायुमंडलीय हवाएं समताप मंडल में ओजोन का किस तरह परिवहन और पुनर्वितरण करती हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत आने वाले नैनीताल स्थित आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (ARIES) समेत देश के कई संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इस घटना का अध्ययन किया। 21-23 किलोमीटर की ऊंचाई पर असामान्य ओजोन ओजोन परत पृथ्वी पर जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) विकिरण का बड़ा हिस्सा अवशोषित करती है। सामान्य तौर पर वायुमंडल में ओजोन की अधिकतम सांद्रता लगभग 25 से 30 किलोमीटर की ऊंचाई पर पाई जाती है। वैज्ञानिकों का मुख्य सवाल यह था कि उत्तरी बंगाल की खाड़ी के ऊपर अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर इतनी अधिक मात्रा में ओजोन कैसे जमा हुई। इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए शोधकर्ताओं ने देश के विभिन्न हिस्सों से प्राप्त रडार, मौसम गुब्बारों, उपग्रहों और उन्नत वायुमंडलीय मॉडलों के आंकड़ों का एक साथ विश्लेषण किया। देशभर के रडार और मौसम गुब्बारों से जुटाया डेटा यह अध्ययन NETRAD-ASMA अभियान के पहले चरण के तहत किया गया। इस राष्ट्रव्यापी अभियान में भारत के विभिन्न अनुसंधान संस्थानों ने मिलकर वायुमंडल की जटिल प्रक्रियाओं का अध्ययन किया। अभियान के दौरान नैनीताल स्थित ARIES में विकसित 206.5 मेगाहर्ट्ज स्ट्रैटोस्फियर-ट्रोपोस्फियर (ST) रडार ने हरिणघाटा, गंडकी और कोच्चि में मौजूद समान रडार प्रणालियों के साथ मिलकर डेटा एकत्र किया। इसके अलावा वैज्ञानिकों ने ऐसे मौसम गुब्बारे भी छोड़े, जिनमें वायुमंडलीय परिस्थितियों और ओजोन के स्तर को मापने वाले उपकरण लगाए गए थे। देश के अलग-अलग हिस्सों से एकत्र किए गए आंकड़ों ने वैज्ञानिकों को भारत के ऊपर हवा के पैटर्न और ऊर्ध्वाधर वायु गति की तुलना करने में मदद की। सूर्य की रोशनी नहीं, हवा के परिवहन से बनी परत अध्ययन में एक महत्वपूर्ण संकेत यह मिला कि ओजोन में बढ़ोतरी दिन और रात दोनों समय देखी गई। इससे वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि सूर्य के प्रकाश से होने वाली प्रकाश-रासायनिक प्रक्रियाएं इस घटना का प्राथमिक कारण नहीं थीं। शोधकर्ताओं ने गुब्बारा मापों की तुलना देशव्यापी रडार नेटवर्क के आंकड़ों के साथ-साथ Aura MLS और INSAT-3DR उपग्रहों से प्राप्त प्रेक्षणों और उन्नत वायुमंडलीय मॉडलों से की। विश्लेषण में संवहन, हवा की अपरूपण गति, क्षैतिज परिवहन और ऊर्ध्वाधर वायु गति जैसी प्रक्रियाओं का अध्ययन किया गया। प्रेक्षणों में निचले समताप मंडल में लगातार नीचे की ओर हवा की गति के संकेत मिले। ओजोन युक्त हवा के परिवहन से हुई वृद्धि कई अलग-अलग उपकरणों और प्रणालियों से मिले साक्ष्यों को जोड़ने के बाद वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि उत्तरी बंगाल की खाड़ी के ऊपर ओजोन की असामान्य वृद्धि मुख्य रूप से ओजोन युक्त हवा के क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर परिवहन से जुड़ी थी। इसके बाद वायुमंडलीय गति और वायु द्रव्यमान के संपीड़न ने ओजोन की सांद्रता बढ़ाने में भूमिका निभाई। इस खोज को भारतीय उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में सर्दियों के दौरान समताप मंडलीय ओजोन के पुनर्वितरण का महत्वपूर्ण प्रायोगिक प्रमाण माना जा रहा है। अध्ययन के निष्कर्ष American Geophysical Union (AGU) के Earth and Space Science जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। शोध में ARIES के डॉ. मनीष नाजा और डॉ. समरेश भट्टाचार्य समेत कई संस्थानों के वैज्ञानिकों ने योगदान दिया। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अध्ययन देशभर में मौजूद वायुमंडलीय अनुसंधान केंद्रों से समन्वित तरीके से आंकड़े जुटाने की उपयोगिता को सामने लाता है। साथ ही, यह स्वदेशी रूप से विकसित रडार और गुब्बारा-आधारित प्रणालियों की मदद से भारत के ऊपर समताप मंडल में होने वाली जटिल वायुमंडलीय प्रक्रियाओं को समझने की क्षमता को भी रेखांकित करता है।

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