4 फरवरी 2026। वर्ष 2025 भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक निर्णायक साल साबित हुआ है। राष्ट्रीय प्रक्षेपण क्षमता, अंतरिक्ष अवसंरचना, स्वदेशी तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के मोर्चे पर इसरो ने कई ऐसे कदम उठाए हैं जिन्होंने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में मजबूती से खड़ा कर दिया है।
डॉकिंग टेक्नोलॉजी में बड़ी कामयाबी
2025 की सबसे अहम उपलब्धियों में एसपीएडेक्स (SPADEX) मिशन रहा, जिसमें उपग्रहों के बीच डॉकिंग और अनडॉकिंग के साथ-साथ विद्युत ऊर्जा हस्तांतरण का सफल प्रदर्शन किया गया। यह तकनीक भविष्य के अंतरिक्ष स्टेशन संचालन और कक्षा में सेवा (ऑन-ऑर्बिट सर्विसिंग) के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस सफलता के साथ भारत अंतरिक्ष में डॉकिंग तकनीक का प्रदर्शन करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया।
पीएसएलवी और पीओईएम का दमदार प्रदर्शन
पीएसएलवी-सी60 मिशन के तहत उड़ान भरने वाले पीएसएलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (POEM-04) ने 1000 से अधिक परिक्रमाएं पूरी कर एक नया रिकॉर्ड बनाया। इस मिशन में इसरो, स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के कई पेलोड शामिल थे। कक्षा में रोबोटिक आर्म का परीक्षण और सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में बीजों के अंकुरण जैसे प्रयोगों ने वैज्ञानिक दृष्टि से इस मिशन को खास बना दिया।
100वां प्रक्षेपण और निसार की ऐतिहासिक उड़ान
जनवरी 2025 में जीएसएलवी-एफ15/एनवीएस-02 मिशन श्रीहरिकोटा से इसरो का 100वां प्रक्षेपण बना। वहीं जीएसएलवी-एफ16/निसार मिशन ने इसरो-नासा के पहले संयुक्त उपग्रह मिशन के रूप में इतिहास रचा। निसार दुनिया का पहला दोहरी आवृत्ति (एल-बैंड और एस-बैंड) एसएआर उपग्रह है, जिसमें नासा के 12 मीटर के विशाल एंटीना को भारतीय सैटेलाइट बस पर सफलतापूर्वक एकीकृत किया गया।
एलवीएम3 से भारी उपग्रहों का नया रिकॉर्ड
एलवीएम3-एम5/सीएमएस-03 मिशन के जरिए भारत ने अब तक का सबसे भारी जीटीओ उपग्रह लॉन्च किया। इसके बाद एलवीएम3-एम6/ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 मिशन ने भारतीय धरती से सबसे भारी उपग्रह प्रक्षेपण का रिकॉर्ड कायम किया। इस मिशन में उन्नत थ्रस्ट फ्रेम, बढ़ी हुई पेलोड क्षमता और एस200 मोटर के लिए अत्याधुनिक विद्युत-यांत्रिक सक्रियण प्रणाली का सफल सत्यापन हुआ।
इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश, भविष्य की तैयारी
सरकार ने श्रीहरिकोटा में तीसरे प्रक्षेपण पैड के निर्माण को वित्तीय मंजूरी दी है। तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में एसएसएलवी के लिए समर्पित लॉन्च साइट का निर्माण भी शुरू हो चुका है। इसके अलावा ठोस प्रणोदक उत्पादन, क्रायोजेनिक इंजन परीक्षण और टाइटेनियम मिश्र धातु टैंक निर्माण के लिए नई सुविधाएं 2025 में चालू की गईं।
स्वदेशी प्रोसेसर और री-यूजेबल टेक्नोलॉजी
इसरो और सेमीकंडक्टर लैबोरेटरी के सहयोग से देश का पहला 32-बिट अंतरिक्ष-योग्य प्रोसेसर ‘विक्रम 3201’ विकसित किया गया। वहीं पुनः प्रयोज्य अंतरिक्ष परिवहन तकनीकों, क्रायोजेनिक इंजन के री-इग्निशन और थ्रॉटलिंग जैसे परीक्षणों ने भविष्य के मिशनों के लिए मजबूत आधार तैयार किया है।
निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स को बढ़ावा
एसएसएलवी तकनीक को हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को हस्तांतरित करने के साथ-साथ कई अहम तकनीकों को निजी उद्योगों और स्टार्टअप्स को सौंपा गया है। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड अब तक 100 से अधिक तकनीक हस्तांतरण समझौतों पर हस्ताक्षर कर चुका है, जिससे देश का अंतरिक्ष इकोसिस्टम तेजी से विस्तार पा रहा है।
वैश्विक सहयोग और आपदा प्रबंधन में भारत की भूमिका
2025 में इसरो ने 10 अंतरराष्ट्रीय सहयोग दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। निसार उपग्रह का जुलाई 2025 में प्रक्षेपण, संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिक कार्य समूहों में भारतीय नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन पहलों में सक्रिय भागीदारी ने भारत की वैश्विक साख को और मजबूत किया है। बीते तीन वर्षों में इन पहलों के तहत भारत को 2,260 से अधिक सैटेलाइट डेटा सेट प्राप्त हुए, जिससे आपदा प्रबंधन में त्वरित प्रतिक्रिया संभव हुई।
यह जानकारी केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में लिखित उत्तर के माध्यम से दी।
साफ है, 2025 सिर्फ उपलब्धियों का साल नहीं था, बल्कि भारत के अंतरिक्ष भविष्य की मजबूत नींव रखने वाला वर्ष भी रहा।














