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भारत-ईयू व्यापार समझौता: ब्रसेल्स को पूरब में साझेदार की इतनी जल्दी क्यों है?

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prativad
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📍 भोपाल
भारत-ईयू व्यापार समझौता: ब्रसेल्स को पूरब में साझेदार की इतनी जल्दी क्यों है?
27 जनवरी 2026। भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन मंगलवार से नई दिल्ली में शुरू हो रहा है। सबकी निगाहें उस मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर टिकी हैं, जिस पर करीब 19 साल से बातचीत चल रही है। यूरोपीय संघ इस डील को “सभी समझौतों की जननी” बता रहा है, जो इसके उत्साह से ज्यादा उसकी रणनीतिक हड़बड़ी को दर्शाता है।

सम्मेलन से पहले ईयू की शीर्ष राजनयिक काजा कैलास ने भारत को यूरोप की मजबूती के लिए “अपरिहार्य” बताया। यूरोपीय आयोग अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा का गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि होना भी साफ संकेत देता है कि इस साल भारत ईयू की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है।

असल वजह भू-राजनीति है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक टैरिफ नीति, नाटो सहयोगियों पर दबाव और यूक्रेन युद्ध में यूरोप की सीमित भूमिका ने ब्रसेल्स को नए भरोसेमंद साझेदार तलाशने पर मजबूर किया है। अमेरिका सीधे रूस से बात कर रहा है, जिससे यूरोप खुद को हाशिए पर महसूस कर रहा है। ऐसे में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था भारत, ईयू के लिए रणनीतिक ज़रूरत बन गया है।

ईयू इस समझौते के जरिए भारतीय बाजार में ज्यादा पहुंच चाहता है। खासकर यूरोपीय कारों, शराब, फार्मास्यूटिकल्स, सेमीकंडक्टर्स और स्वच्छ तकनीक के लिए। प्रस्तावित FTA का दायरा फिलहाल सामान, सेवाओं और व्यापार नियमों तक सीमित रखा गया है, जबकि निवेश संरक्षण और भौगोलिक संकेतों पर अलग बातचीत चल रही है।

कार सेक्टर इस डील का सबसे अहम हिस्सा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत EU से आयातित कारों पर टैरिफ को 110 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत तक लाने पर विचार कर रहा है, वो भी एक तय सीमा और न्यूनतम कीमत के साथ। इसका मकसद घरेलू ऑटो उद्योग को झटका दिए बिना यूरोपीय कंपनियों को मौका देना है। भारत सालाना 44 लाख कारों का बाजार है, जिसमें EU का हिस्सा अभी सिर्फ 4 प्रतिशत है।

भारत के लिए यह समझौता भी उतना ही अहम है। ट्रम्प प्रशासन के 50 प्रतिशत टैरिफ ने नई दिल्ली को यह एहसास करा दिया है कि WTO का दौर लगभग खत्म हो चुका है। इसी वजह से भारत बीते चार सालों में नौ व्यापार समझौते कर चुका है और अमेरिका समेत एक दर्जन देशों या ब्लॉकों से बातचीत कर रहा है।

इसके बदले भारत टेक्सटाइल, कपड़ा, फार्मा और मशीनरी सेक्टर में EU से टैरिफ में राहत चाहता है। साथ ही ‘डेटा-सिक्योर’ स्टेटस, आसान वर्क परमिट और प्रोफेशनल मोबिलिटी पर भी जोर दे रहा है।

हालांकि रास्ता आसान नहीं है। एग्रीकल्चर, डेयरी, शराब पर टैरिफ, डेटा सुरक्षा और वित्तीय सेवाओं में विदेशी पहुंच जैसे मुद्दे अब भी अटके हुए हैं। राज्यों की राजनीतिक और राजस्व चिंताएं केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती हैं।

2024 में भारत और EU के बीच व्यापार 190 अरब डॉलर तक पहुंचा था। अमेरिका पर निर्भरता घटाने की मजबूरी दोनों को करीब ला रही है। सच्चाई यह है कि 4.2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था होने के बावजूद EU की विकास संभावनाएं सीमित हैं, जबकि भारत में अभी काफी कुछ खुलना बाकी है। यही वजह है कि इस बार ब्रसेल्स भारत को रिझाने में ज्यादा उत्सुक दिख रहा है, न कि उल्टा।
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