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जीते जी भेदभाव, मरने के बाद भी जाति

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Place: भोपाल                                                👤By: prativad                                                                Views: 149

नई दिल्ली 31 जनवरी 2026। देश के एक गांव से सामने आई तस्वीरें और एक रसीद सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। ये तस्वीरें और दस्तावेज एक गंभीर सवाल उठाते हैं: क्या भारत में आज भी इंसान की आखिरी यात्रा उसकी जाति तय करती है?

पहली तस्वीरों में साफ दिखता है कि गांव में अलग-अलग शमशान घाट बनाए गए हैं। एक बोर्ड पर लिखा है – “SC शमशान घाट”, वहीं दूसरे पर – “General शमशान घाट”। यानी मौत के बाद भी समानता नहीं।

ग्रामीणों का कहना है कि गांव में रहने, पानी के स्रोत, रास्तों और अब श्मशान तक में जातिगत विभाजन है। तस्वीरों में दोनों श्मशानों के अलग-अलग संकेतक लगे हैं, जो इस व्यवस्था को औपचारिक रूप से स्वीकार करते दिखाई देते हैं।

अंतिम संस्कार की रसीद ने बढ़ाई बेचैनी

दूसरी तस्वीर एक श्मशान घाट की रसीद की है, जिसमें अंतिम संस्कार के खर्चों का विवरण दर्ज है।
रसीद के अनुसार:

लकड़ी (300 किलो): ₹2400

पहले दिन पंडित की दक्षिणा: ₹1000

दूसरे दिन पंडित की दक्षिणा: ₹500

सेवाधार शुल्क: ₹200

लकड़ी पहुंचाने की मजदूरी: ₹100

कुल खर्च: ₹4200

इस रसीद के साथ लिखा गया वाक्य भावनात्मक चोट करता है:
“बस इतना ही चाहिए अंतिम यात्रा के लिए, बाकी तो सब संसार बांट लेगा।”

सवाल व्यवस्था पर, सिर्फ गांव पर नहीं

संविधान समानता की बात करता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कहती है। यह मामला सिर्फ एक गांव का नहीं लगता, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जो आज भी कई इलाकों में जिंदा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि श्मशान घाटों का जाति के आधार पर विभाजन संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ है। यदि यह सरकारी पंचायत या स्थानीय निकाय की जानकारी में है, तो यह और भी गंभीर मामला बनता है।

प्रशासनिक चुप्पी, सामाजिक सवाल
अब तक स्थानीय प्रशासन की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन सोशल मीडिया पर लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं:
क्या समानता सिर्फ कागज़ों में है?

यह खबर बताती है कि भारत ने तकनीक, अर्थव्यवस्था और अंतरिक्ष में भले लंबी छलांग लगाई हो, लेकिन सामाजिक बराबरी की यात्रा अभी अधूरी है।
क्योंकि जब इंसान को मरने के बाद भी “जनरल” और “SC” में बांटा जाए, तो समस्या सिर्फ सिस्टम की नहीं, सोच की होती है।

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