नई दिल्ली 13 अगस्त 2026। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि भारत नॉर्दर्न सी रूट (NSR) में सक्रिय रुचि दिखाने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। उन्होंने कहा कि भारत और चीन समेत कई देश इस आर्कटिक समुद्री मार्ग के इस्तेमाल और रूस के साथ सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा कर रहे हैं।
पुतिन ने गुरुवार को रूस के सुदूर पूर्व और सखालिन क्षेत्र के दौरे के दौरान कहा कि आर्कटिक शिपिंग रूट को लेकर अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है। उनके मुताबिक, पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच एशियाई देशों और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के लिए रूस के साथ व्यापार के नए रास्ते तलाशना महत्वपूर्ण हो गया है।
भारत-रूस के लिए रणनीतिक महत्व
भारत के लिए NSR इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार के लिए एक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध करा सकता है। रूस के उत्तरी तट के साथ आर्कटिक महासागर से गुजरने वाला करीब 5,600 किलोमीटर लंबा नॉर्दर्न सी रूट पूर्वी एशिया और यूरोप के बीच पारंपरिक समुद्री मार्गों की तुलना में छोटा है।
रूस का दावा है कि इस मार्ग से स्वेज नहर के रास्ते की तुलना में दूरी में करीब 40 फीसदी तक और यात्रा समय में लगभग दो सप्ताह तक की बचत हो सकती है। मध्य पूर्व में जारी संघर्षों के कारण स्वेज मार्ग पर पैदा हुई अनिश्चितताओं ने भी वैकल्पिक समुद्री मार्गों की अहमियत बढ़ाई है।
भारत और रूस के बीच 10,380 किलोमीटर लंबे चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर, जिसे ईस्टर्न मैरीटाइम कॉरिडोर भी कहा जाता है, के शुरू होने के बाद दोनों देशों के बीच समुद्री संपर्क को लेकर सहयोग बढ़ा है।
रोसाटॉम को भारत के साथ समझौते का निर्देश
रूसी प्रधानमंत्री मिखाइल मिशुस्तिन ने पिछले महीने सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम को आर्कटिक रूट पर समुद्री माल ढुलाई के लिए भारत के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) करने का निर्देश दिया था।
रोसाटॉम NSR का अधिकृत ऑपरेटर और समन्वयक है। कंपनी रूस के परमाणु ऊर्जा से चलने वाले आइसब्रेकर बेड़े का भी प्रबंधन करती है। ये जहाज आर्कटिक समुद्री मार्ग में जमी बर्फ को हटाकर दूसरे जहाजों के लिए रास्ता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत को बंदरगाहों तक पहुंच का रास्ता
राष्ट्रपति पुतिन की दिसंबर में भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स सपोर्ट (RELOS) समझौते को औपचारिक रूप दिया था। इससे भारत को व्लादिवोस्तोक से मरमंस्क तक NSR पर स्थित बंदरगाहों तक पहुंच मिलने की संभावना मजबूत हुई है।
भारत के लिए यह मार्ग रूस के साथ व्यापार बढ़ाने के साथ-साथ उत्तरी और पूर्वी यूरोप के बाजारों तक पहुंच के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
आइस-क्लास जहाजों पर भी जोर
रूस के फार ईस्ट और आर्कटिक विकास मंत्री एलेक्सी चेकुनकोव ने जून में कहा था कि भारत आर्कटिक क्षेत्र और रूसी फार ईस्ट के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाने में रुचि रखता है। दोनों देश आइस-क्लास जहाजों और कंटेनर शिपिंग के विकास की संभावनाओं पर भी काम कर रहे हैं।
भारतीय शिपयार्ड आर्कटिक जैसे कठिन और बर्फीले समुद्री क्षेत्रों में संचालन के लिए नॉन-न्यूक्लियर आइसब्रेकर बनाने की संभावनाओं पर भी चर्चा कर रहे हैं।
रूस NSR को एक प्रमुख वैश्विक व्यापार मार्ग में बदलने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। ऐसे में भारत की बढ़ती भागीदारी दोनों देशों के व्यापारिक और समुद्री सहयोग को एक नया रणनीतिक आयाम दे सकती है।















