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क्या नई विश्व व्यवस्था में परंपरागत अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं टिक पाएंगी?

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Location: भोपाल                                                 👤Posted By: prativad                                                                         Views: 973

भोपाल: 7 जुलाई 2024। अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य बदल रहा है। पश्चिमी ताकतों का दबदबा, जिसने जी7 और नाटो जैसे संस्थानों को जन्म दिया, कम हो रहा है, जिससे "नई विश्व व्यवस्था" में इन निकायों की व्यवहार्यता के बारे में सवाल उठ रहे हैं।

कुछ लोगों का तर्क है कि इन संस्थाओं को पश्चिमी अर्थव्यवस्था और सैन्य प्रभाव को मजबूत करने के लिए डिजाइन किया गया था। धनी लोकतंत्रों के समूह, जी7, ने आर्थिक नीतियों के समन्वय पर ध्यान केंद्रित किया। नॉर्थ अटलांटिक संधि संगठन, नाटो, का लक्ष्य शीत युद्ध के दौरान सोवियत आक्रमण को रोकना था।

पुराने ढर्रे को चुनौतियां:
बदलती ताकत का समीकरण: चीन और भारत जैसी आर्थिक महाशक्तियों का उदय जी7 की प्रासंगिकता को चुनौती देता है। क्या इन नए खिलाड़ियों का स्वागत किया जाएगा, या यह समूह बहुध्रुवीय दुनिया के अनुकूल होने के लिए संघर्ष करेगा?
वैश्विक मुद्दों के समाधान में प्रभावशीलता: क्या ये संस्थाएं जलवायु परिवर्तन, महामारी और साइबर खतरों जैसी तेजी से जटिल होती वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान कर सकती हैं? उनका पारंपरिक फोकस पर्याप्त नहीं हो सकता है।
वैधता संबंधी चिंताएं: आलोचकों का तर्क है कि नाटो जैसे संस्थान पश्चिमी वर्चस्व के बीते युग का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या वे अपने कथित पूर्वाग्रह को दूर कर सकते हैं और उभरती शक्तियों का विश्वास अर्जित कर सकते हैं?

संभावित भविष्य की राहें:
सुधार और विस्तार: जी7 में वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को दर्शाते हुए नए सदस्य शामिल हो सकते हैं। इसी तरह, नाटो पारंपरिक सुरक्षा खतरों से परे अपना ध्यान केंद्रित कर सकता है।
नए शक्ति केंद्रों के साथ सहयोग: ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) जैसे संस्थानों के साथ सहयोग अधिक समावेशी वैश्विक शासन ढांचे को बढ़ावा दे सकता है।
साझा चुनौतियों पर ध्यान दें: जलवायु परिवर्तन और महामारियों से निपटने जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना नई प्रासंगिकता का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

भविष्य अभी अज्ञात है:
इन संस्थाओं का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। वे अनुकूलन कर सकते हैं और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए प्रभावी उपकरण बन सकते हैं या नहीं, यह एक अनुत्तरित प्रश्न है। केवल समय ही बताएगा कि क्या वे अपने अतीत को छोड़ सकते हैं और अधिक समावेशी और सहयोगी दृष्टिकोण अपना सकते हैं।

विशेषज्ञों की राय:
विशेषज्ञों द्वारा अंतरराष्ट्रीय संबंधों या शिक्षाविदों के इन संस्थाओं के संभावित भविष्य पर उनके विचारों को शामिल करने से लेख को और समृद्ध किया जा सकता है।

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