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कान के पीछे दर्द को हल्के में न लें, यह हो सकता है चेहरे के लकवे का शुरुआती संकेत

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Place: भोपाल                                                👤By: prativad                                                                Views: 777

सर्दियों में तेजी से बढ़ रहे बेल्स पाल्सी के मामले

16 दिसंबर 2025। कान के पीछे हल्का सा दर्द अक्सर लोग मौसम बदलने, थकान या सर्दी का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन डॉक्टरों की मानें तो यही दर्द कई बार चेहरे के लकवे यानी बेल्स पाल्सी की पहली चेतावनी हो सकता है। सर्दियों के मौसम में इसके मामलों में साफ तौर पर बढ़ोतरी देखी जा रही है।

इंदौर के बड़े अस्पतालों, खासकर एमवाय अस्पताल में हर सप्ताह औसतन 7 से 10 नए मरीज सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकतर मरीज शुरुआती दिनों में केवल कान के पीछे होने वाले दर्द को गंभीर नहीं समझते। जब तक चेहरे में टेढ़ापन या कमजोरी नजर आती है, तब तक बीमारी आगे बढ़ चुकी होती है।

क्या है बेल्स पाल्सी
बेल्स पाल्सी एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, जिसमें चेहरे की एक तरफ अचानक कमजोरी या लकवा आ जाता है। इसका कारण चेहरे की नस यानी फेशियल नर्व में सूजन या दबाव माना जाता है। आम भाषा में इसे चेहरे का लकवा कहा जाता है। इसमें केवल चेहरे की मांसपेशियां प्रभावित होती हैं। हाथ-पैर सामान्य रूप से काम करते रहते हैं।

यह सामान्य लकवे या स्ट्रोक से अलग है। स्ट्रोक में दिमाग प्रभावित होता है, जिसके कारण चेहरे के साथ-साथ हाथ-पैर में कमजोरी, बोलने में दिक्कत और संतुलन बिगड़ने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इसलिए चेहरे में अचानक बदलाव दिखे तो घबराने के बजाय सही पहचान और समय पर जांच बेहद जरूरी है।

सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है खतरा
ठंड के मौसम में सर्दी-जुकाम और वायरल संक्रमण आम होते हैं। यही वायरस कई बार गले या नाक के रास्ते शरीर में प्रवेश कर फेशियल नर्व को प्रभावित करता है। डॉक्टर बताते हैं कि कुछ वायरस लंबे समय तक शरीर में सुप्त अवस्था में रहते हैं और इम्युनिटी कमजोर होते ही सक्रिय होकर नसों पर हमला कर देते हैं। यही वजह है कि सर्दियों में बेल्स पाल्सी के केस ज्यादा देखने को मिलते हैं।

दो शुरुआती लक्षण जो नजरअंदाज नहीं करने चाहिए
पहला, कान के पीछे दर्द या खिंचाव, क्योंकि फेशियल नर्व इसी हिस्से से होकर गुजरती है।
दूसरा, चेहरे का तिरछा दिखना या मुस्कुराने, आंख बंद करने में दिक्कत।
इसके अलावा आंख पूरी तरह बंद न हो पाना, मुंह से पानी गिरना, स्वाद में बदलाव और चेहरे में सुन्नपन भी संकेत हो सकते हैं।

डॉक्टर के पास कब जाएं
इस बीमारी में पहले 24 से 48 घंटे बेहद अहम होते हैं। यदि इसी समय इलाज शुरू हो जाए तो पूरी तरह ठीक होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। देरी करने पर वायरस नसों को ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे रिकवरी में समय लगता है या असर पूरी तरह खत्म नहीं होता।

इलाज कैसे होता है
इलाज में एंटी-वायरल दवाओं के साथ सूजन कम करने के लिए स्टेरॉयड दिए जाते हैं। स्टेरॉयड के दौरान ब्लड प्रेशर और शुगर बढ़ने की आशंका रहती है, इसलिए मरीज की नियमित जांच जरूरी होती है। इसके साथ चेहरे की फिजियोथेरेपी भी इलाज का अहम हिस्सा है।

घबराने की जरूरत नहीं
डॉक्टरों के मुताबिक समय पर इलाज, दवाओं का सही सेवन और नियमित फिजियोथेरेपी से करीब 95 प्रतिशत मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं। सबसे जरूरी है शुरुआती संकेतों को पहचानना और देरी न करना।

आम भ्रांति और सच्चाई
भ्रांति: चेहरे का टेढ़ापन मतलब स्ट्रोक।
सच्चाई: हर बार स्ट्रोक नहीं होता, कई मामलों में यह बेल्स पाल्सी भी हो सकता है और यह पूरी तरह ठीक हो सकता है।

कुल मिलाकर, कान के पीछे होने वाला दर्द छोटा संकेत लग सकता है, लेकिन कभी-कभी यही बड़ी बीमारी की पहली दस्तक होता है। सतर्क रहें, समय पर जांच कराएं और खुद को जोखिम में न डालें।

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