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डीपफेक का बढ़ता खतरा: जब तकनीक ग्लोबल राजनीति को अस्थिर करने लगे

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Place: भोपाल                                                👤By: prativad                                                                Views: 157

27 जनवरी 2026। डीपफेक तकनीक अब केवल डिजिटल प्रयोग या मनोरंजन का साधन नहीं रही। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार किए जा रहे नकली वीडियो, तस्वीरें और ऑडियो वैश्विक राजनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं। डिजिटल युग में समस्या सूचना की कमी नहीं, बल्कि उसकी प्रामाणिकता है। भरोसे का यह संकट ही डीपफेक को खतरनाक बनाता है।

हालिया सर्वे बताते हैं कि दुनिया के करीब 60 प्रतिशत लोग पिछले एक साल में किसी न किसी रूप में डीपफेक कंटेंट देख चुके हैं। शुरुआत में यह तकनीक हल्के-फुल्के या हास्यपूर्ण प्रयोगों तक सीमित थी, लेकिन अब इसका इस्तेमाल जानबूझकर भ्रम, अविश्वास और राजनीतिक तनाव फैलाने के लिए किया जा रहा है।

मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान वायरल हुआ एक फर्जी वीडियो इसका उदाहरण है, जिसमें कथित तौर पर फाइटर जेट के नुकसान को दिखाया गया था। कुछ ही घंटों में इस वीडियो ने भावनाएं भड़का दीं और हालात आधिकारिक खंडन से पहले ही बिगड़ने लगे। इस घटना ने साफ कर दिया कि डीपफेक अब सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।

इसी पृष्ठभूमि में 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में दुनिया के कई देशों ने डीपफेक पर सख्त रुख अपनाया है। इंडोनेशिया ने दुरुपयोग के मामलों में AI प्लेटफॉर्म तक पहुंच अस्थायी रूप से रोक दी। वियतनाम ने AI से तैयार “राष्ट्र-विरोधी” कंटेंट के वितरण को अपराध मानते हुए गिरफ्तारी वारंट जारी किए। यूरोपीय यूनियन ने AI-जेनरेटेड कंटेंट की पहचान और लेबलिंग को लेकर स्पष्ट नियम बनाने शुरू कर दिए हैं।

अमेरिका में भी प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने की दिशा में कानून बनाए गए हैं, जिनका मकसद अनधिकृत और नुकसानदेह डीपफेक को तेज़ी से हटाना है। वहीं रूस ने अवैध डीपफेक से निपटने के लिए कानूनी ढांचा मजबूत करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जिसमें अनिवार्य लेबलिंग और दंडात्मक प्रावधान शामिल हैं।

डीपफेक का स्वरूप भी बदल रहा है। अब यह बड़े रणनीतिक अभियानों के बजाय स्थानीय स्तर पर त्वरित सामाजिक अस्थिरता फैलाने का हथियार बनता जा रहा है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंटेंट सोर्स वेरिफिकेशन जैसे तकनीकी मानकों और बहुपक्षीय मंचों पर सहमति की जरूरत महसूस की जा रही है।

स्पष्ट है कि डीपफेक का मसला केवल टेक्नोलॉजी का नहीं है। यह उस दौर में सच, भरोसे और लोकतांत्रिक राजनीति को बचाए रखने की चुनौती है, जहां देखना अब विश्वास करने की गारंटी नहीं रहा।

- दीपक शर्मा

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