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क्या बिना सर्जरी के ठीक होगा बढ़ा हुआ प्रोस्टेट? साउंड वेव थेरेपी से जगी नई उम्मीद

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Place: बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया, हिस्टोट्रिप्सी, HistoSonics, फोकस्ड अल्ट्रासाउंड फाउंडेशन                                                👤By: prativad                                                                Views: 141

12 मई 2026। दुनिया भर में लाखों बुजुर्ग पुरुष बढ़े हुए प्रोस्टेट यानी BPH (बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया) की समस्या से जूझते हैं। बार-बार पेशाब आना, रात में नींद टूटना और पेशाब करने में दिक्कत जैसी परेशानियां उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं। अब वैज्ञानिक एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं, जो बिना किसी चीरे, सुई या रेडिएशन के इस बीमारी का इलाज कर सकती है।

इस नई तकनीक का नाम “हिस्टोट्रिप्सी” (Histotripsy) है। इसमें फोकस्ड साउंड वेव्स यानी केंद्रित अल्ट्रासाउंड तरंगों की मदद से शरीर के अंदर मौजूद खराब टिशू को तोड़ा जाता है। खास बात यह है कि इसमें शरीर को काटने या सर्जिकल उपकरण अंदर डालने की जरूरत नहीं पड़ती।

हाल के वर्षों में इस तकनीक ने वैश्विक स्तर पर ध्यान खींचा है। हेल्थ टेक कंपनी HistoSonics को TIME मैगजीन ने 2026 की 10 सबसे प्रभावशाली हेल्थ और लाइफ साइंस कंपनियों में शामिल किया है। कंपनी का Edison Histotripsy System फिलहाल लिवर ट्यूमर के इलाज के लिए अमेरिकी FDA से मंजूरी प्राप्त कर चुका है।

अब यह तकनीक बढ़े हुए प्रोस्टेट के इलाज में भी उम्मीद जगा रही है। फोकस्ड अल्ट्रासाउंड फाउंडेशन के अनुसार, हांगकांग में एक क्लिनिकल ट्रायल शुरू हुआ है, जिसमें BPH मरीजों पर इस तकनीक का परीक्षण किया जा रहा है।

भारतीय मूल के वैज्ञानिक का अहम योगदान

इस रिसर्च को आगे बढ़ाने में भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ. यशवंत नंदा कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वे HistoSonics में सीनियर रिसर्च इंजीनियर हैं और उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन में अपनी PhD के दौरान हिस्टोट्रिप्सी पर गहन शोध किया।

डॉ. नंदा कुमार का फोकस इस चुनौती पर था कि बढ़े हुए प्रोस्टेट के कठोर और रेशेदार टिशू पर साउंड वेव्स कितनी प्रभावी ढंग से काम कर सकती हैं। प्रोस्टेट टिशू सामान्यतः काफी घना और मजबूत होता है, इसलिए वैज्ञानिकों के लिए यह समझना जरूरी था कि अल्ट्रासाउंड एनर्जी ऐसे टिशू के साथ कैसे व्यवहार करती है।

उनका शोध प्रतिष्ठित जर्नल Scientific Reports में प्रकाशित हुआ, जिसमें फाइब्रोटिक मानव BPH टिशू पर हिस्टोट्रिप्सी उपचार के अलग-अलग मापदंडों का अध्ययन किया गया। शोध में अल्ट्रासाउंड आधारित तकनीकों के जरिए उपचार के बाद टिशू की कठोरता में आने वाले बदलावों को भी मापा गया। इस अध्ययन को 5,000 से अधिक बार देखा जा चुका है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

डॉ. नंदा कुमार के कार्य को वैज्ञानिक समुदाय में भी सराहना मिली है। उन्हें 2024 IEEE दक्षिण एशियाई अल्ट्रासोनिक्स संगोष्ठी में “सर्वश्रेष्ठ पेपर पुरस्कार” से सम्मानित किया गया। इसके अलावा वे IEEE Ultrasonics, Ferroelectrics and Frequency Control Society तथा American Society of Echocardiography Hackathon की विजेता टीम का हिस्सा भी रहे हैं।

सर्जरी के भविष्य को बदल सकती है तकनीक

विशेषज्ञों का मानना है कि हिस्टोट्रिप्सी केवल एक नई मशीन या एक बीमारी के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चिकित्सा विज्ञान में एक बड़े बदलाव का संकेत है। इसका उद्देश्य बीमारियों का अधिक सटीक और कम इनवेसिव तरीके से इलाज करना है।

यदि क्लिनिकल ट्रायल सफल रहते हैं, तो भविष्य में बढ़े हुए प्रोस्टेट जैसी आम बीमारियों के इलाज के लिए पारंपरिक सर्जरी की जरूरत काफी कम हो सकती है। वैज्ञानिक अब इस दिशा में काम कर रहे हैं कि क्या भविष्य की सर्जरी बिना चीरे के संभव हो सकती है।

डॉ. यशवंत नंदा कुमार का शोध इस बात का उदाहरण है कि भारतीय मूल के वैज्ञानिक वैश्विक स्तर पर ऐसी तकनीकों के विकास में अहम योगदान दे रहे हैं, जो आने वाले समय में चिकित्सा जगत का चेहरा बदल सकती हैं।

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